सोमवार, 26 जुलाई 2010

वीर बुंदेले: जितेन्द्रिय वीर छ्त्रसाल

जितेन्द्रिय वीर छ्त्रसाल







वीर बुंदेलेछत्रसाल युवा थे । बात उस समय की है । उनका कद लम्बा था । शरीर के एक एक अवयव अति सुगठित और सुडौल थे । नेत्रों में अनोखा की आकर्षण । मुख्मंडल तेजस्वी आभा से युक्त था ।उनका गौरवर्ण का मुखड़ा किसी के भी मन को मोह लेता । लोगों की आखें बरबस उनकी ओर खिंची चली जातीं वृद्ध एवं वृद्धाएं उनमें अपने पुत्र की छवि निहारतीं युवक उनको अपने सुहृद के रूप में पाते । सैनिक अपने नेता की दृष्टि से देखते । उनके एक संकेतपर मर मिटने को सदा तत्पर रहते ।



 

कुमारियां मन ही मन अपने इष्टदेव से प्राथ्रना करती कि भगवन मुझे भी छत्रसाल ऐसा ही वीर और तेजस्वी पति दो । बच्चे तो उनको चाचा चाचा कह कर घेर लेते । वे भी उनको रोचक कहानिंया सुनाते । उनकी बोली में एक ऐसी मिटास थी कि सभी उस पर लट्टू हो जाते । सारे बुदेलखंड में वे इतने लोकप्रिय हो गए थे कि सभी के आशा के केन्द्र न गए । जन जन उनको अपने नेता के रूप में देखता ।ऐसा आकर्षक था उनका व्यक्त्तिव । यदि किसी की धन सम्पदा नष्ट हो जाती है तो वह कुछ भी नहीं खोता । क्योंकि उसका अर्जन पुनः किया जा सकता है । स्वास्थ्य में अगर घुन लग गया तो अवष्य कुछ हानि होती है । शरीर में ही तो स्वस्थ मन और मस्तिष्क रह सकता है । शरीरमाद्यंखलु धर्म साधनम । ध्येय साधना का वही तो अनुपम साधन है । माध्यम । किन्तु यदि चरित्र ही नष्ट हो गया तो उसको कोई भी नहीं बचा सकता । वह सर्वस्व से हाथ धो बैठता है । पतन की ओर उन्मुख हो जाता है मन का गुलाम बन जाता है ।वीर छत्रसाल धन, स्वास्थ्य और शील इन तीनों गुणों के धनी थे ।


 दुपहरिया का समय था ।ग्रीष्म ऋतु का । उन दिनों बुंदेखण्ड में धरती जल उठती है । संपूर्ण पठारी क्षेत्र भंयकर लू की चपेट में झुमस रह था । रात अवश्य ही कुछ ठंडी और सुहावनी हो जाती है ।दिन में तो सूर्य की गर्मी से दग्ध पत्थर तो जैसे आग ही उगलने लगते हैं । ऐससे ही समय में छत्रसाल अश्व पर सवार होकर कही जा हरे थे, यदा कदा वे स्वयं भी शत्रु की खोज खबर लेने को निकला करते थे । बिल्कुल अकेले थे । सारा शरीर पसीने से लथपथ था । बहुत थके हुए थे । उनके भव्य भाल पर पसीना चुहचुहाकर बह निकला था ।बीच बीच ममें वे अपने साफे के एक छोर से श्रम बिंदुओं को पोंछते जाते । कहाँ विश्राम करें ? आस पास कही कोई छायादार वृक्ष नहीं दीखा । बेमन से टप्‌ टप्‌ टप्‌ घोड़े को दौड़ाते आगे ही बढ़ते चले गए । एक ग्राम के निकट पहुंचे । वही पर उनको फलकदार एवं छायादार वृक्षों का एक छोटा सा बगीचा दीखा । यहीपर उन्होंने थोड़ी देर तक विश्राम करने का मन बनाया । अश्व भी वही बुरी तरह से हांफ रहा था । उसकी स्थिति को देखकर उनको तरस आ गया । उसकी छाती धौंकनी ऐसी धौक रही थी । नथुने फूल रहे थे । वे उस से उतर पड़े । एक पेड़ी की छाँव में उसको बांध दिया । कमर से फेंटा खोला । धरतीपर उसका बिछा दिया । मस्तक पर सेपगड़ी उतारी । उसका ही सिरहाना लगा वृक्ष की छाया मं लेट गए । उनको न जाने कब नींद आ गयी ।


 आंखे खुली । विस्मय से हैरान रह गए । देखा एक रूपवती युवती सामने खड़ी है, वह विमुगधा सी उनको एकटक निहारे जा रही थी । समझ में न आया । वह यहाँ पर क्यों आयी है । उनका माथा घूम गया । कही यह कोई जादूगरनी तो नहीं है ।जादू टोना करने को आई हो । उन दिनो में जादू टोना बड़ा प्रचलित था ।वे हड़बड़ा कर उठ बैठे ।


हे देवी आप कौन हैं ? यहां पर क्या कर रही हैं ? क्या मैं आपकी कोई सहायता कर सकता हूँ । छत्रसाल ने समझाथा कि यह नवयौवना सचमुच ही किसी संकट में है। अपनी आप बीती , दुखड़ा उनको सुनाने को आयी है ।उनके लिए यह कोई नयी बात नहीं थी साधारणतया इसी प्रकार के लोग प्रायः उनकेपास आते रहते थे । अपनी कष्ट कथा सुनाते । यथाशक्ति वे उनकी सहायता भी करते । अतः बड़ी सहजता से वे उससे उक्त प्रश्न पूंछ बैठे थे । युवती की दृष्टि नीचे की ओर गढ़ी हुई थी । वह अपने पेर के नख से धरती को कुरेद रही थी । सम्भवतः लज्जा ने उसको आ घेरा था ।वह बोलने में सकुचा रही था सोच रही थी सोच रही थी कि ऐसी बात कहे या नहीं । विवके और अविवेक में विपुल युद्ध छिड़ा हुआ था ।उसका मन इसी झूले में पेंगे मार रहा हो तो कोई आश्चर्य नहीं ।


बहिन । निसंकोच रूप से कहो क्या बात है छत्रसाल ने उससे पूछा । बहिन यह शब्द सुनते ही उसका चेहरा फक पड़ गया था । उसने साहस जुटाया । छत्रसाल से जो कुछ कहना था एक झटके में ही कह डाला । उसकी अभिलाषा को सुन छत्रसाल तो एक क्षण को संज्ञा शून्य से हो गए । दंग ओर अवाक । यह उनका पहला अनुभव था । उसको क्या उत्तर दें ? असमंजसता में पड़ गए थे । तुरंत कुछ उत्तर नहीं सूझा । वासना की इन्द्रियां जब शिथिल हो जाती है तब तो उन पर नियंत्रण कर पाना सरल हो जाता है किन्तु यौवन जब अपनी पूर्णता व चरम सीमा पर होताहै तब मन मस्तिष्क और वासनेद्रियों को अपेक्षाकृत काबू में रख पाना कठिन होता है और वह भी ब सुनसान एकांत स्थान हो । कोइ सोदर्यवती युवती सामने खड़ी हो और स्वेच्छा से प्रणयदान की याचना कर रही हो । ऐसे क्षणों में भी जो अडिग रहता हैवही इन्द्रियजयी , जितेन्द्रिय कहलाता है ऐसे क्षणों में बड़े बड़े साधक और तपस्वी की भी परहीक्षा हो जाती है ।


छत्रसाल को लगा कियह युवती उनकी परीक्षा ही लेने को आई है उस दृष्य को दख उन्होंने आंखो मुदं ली । युवती पर काम का मद सवार था । उसके गात थर थर कांप रहे । ।उसकी कामेंनद्रियां प्रदीप्त हो उठी थीं चेहरा लाल हो गया था । उसने छत्रसाल से बड़ी निर्लज्जता सेप्रणय निवेदन किया था कि वीर पुगंव मेंरी उत्कट अभिलाषा है कि तुम मुझे अपने अंक में समेट लो मुझको अपना लो । मैं आपके संसर्ग से एक संतान चाहती हूं । तुम जैसा ही वीरपुत्र मेरी कोख से जन्में । काम पीड़ा सेआहत उसका चेहरा तमतमा उठा था ।छत्रसाल की तोसिट्टी पिट्टी ही गुम हो गयी थी । उनकी बोलती बंद थी । दोनो के लिए परीक्षाकी घड़ी आ उपस्थित हुई थी । छत्रसाल की जितेन्द्रियता की और युवमी सदविवेक की । महर्षि विश्वामित्र के सामने मेनका भी ऐसे ही खड़ी रही होगी । वे तो क्षणिक आवेश में फिसल पड़ी थे किन्तु वह वीर चरित्र की कसौटी पर खरा उतरा था। कुछ ही क्षणामें में वे स्वस्थ हो गए । उनका चित्त स्थिर हो गया था । बाई जी मैं। हौं छत्ता । तौरो लरका ( हे माता । मैं छत्रसाल हूं तेरा पुत्र ) उन्होंने उससे कहा था ।उनके इस वाक्य ने ही उसको पानी पानी कर डाला था ।उसकी वासना की अग्नि पर शीतल जल की फुहार पड़ गयी । उसकी क्षणिक उत्तेजना शांत हो गयी । जिस माहेजाल में वह जा फंस थी वह कट चुका था ।उसका विचलित मन ठिकाने आ लगा था ।उसमें से निकल आयी थीं ऐ वात्सल्यमय जननी । उसके मन ने कहा धरती मैय्‌या तू फट जा । मैं पापिनी उसे समा जाऊँ । तू कैसी है री ? प्रणयकी याचना वह भी अपने पुत्र से हीं ओह यह मैने क्या कर डाला ? यह तो घोर पाप है । अनर्थ हैं उसकी अन्तरात्मा ने उसको कुरेदा और झकझोर डाला ।


वह शर्म से डूब गयी थी उसके नेत्रों से अश्रुधारा बह निकल ।पश्चाताप की गंगा में अवगाहन कर उसका मन शुद्ध और निर्मल हो चुका था ।यदि उस समय छत्रसाल उसको सम्हाल न लेते तो शायद वह आत्महत्या ही कर डालती । उन्होंने उसके मन की अवस्था को भांप लिया था । उसने छत्रसाल को सच्चे मन से अपना पुत्र स्वीकार कर लिया था । व्यक्ति के जीवन में बहुत बार ऐसे क्षण आते ह। यह अस्वाभाविक नहीं शरीर धर्म की मानव सहज दुर्बलता न्यूनाधिक मात्रा मे सबमें होती है । छत्रसाल ने भी एक निष्ठवान पुत्र के समान उसको मां का सम्मान प्रदान किया था । पता नहीं उसने विवाह किया या नहीं । इतिहास इसपर मौन है । कालान्तर में उसके धर्म पुत्र छत्रसाल ने अपनी इस मुंहबोली माता के लिए एक हवेली का निर्माण करवाया था । पन्ना से थोड़ी दूरपर यह स्थित है। बंऊआ जू की हवेली । ( माता जी की हवेली ) के नाम से आज ये प्रसिद्ध है । दोनो जब तक जीवित रहे मां बेटे का धर्म निभाया । बंऊआ जी पुत्र की स्मृति में जीवन पर्यन्त वहीं पर रहीं थी ।


अब नतो बंऊआ जू हैं और नही छत्ता । लेकिन आज भी खड़ी है वह हवेली । इतिहास की वह पंक्ति । छत्रसाल के इन्द्रियनिग्रही जीवन तथा उनके निर्मल वा उज्ज्वल चरित्र की कीर्ति की गाथा गा रही है ।








कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें